जेरार्द केनॅम सम्मोहक छवि 


एक्रिलिक रंगों से कनवास पर बने बेनिन के चित्रकार जेरार्द केनॅम के इन दो चित्रों में क्या समानता है ? सर्वप्रथम न्यूनतम रंगों का उपयोग (चित्रकार को काले व सफ़ेद और यदि बहुत आवश्यकता हो तो प्राथमिक रंगों का उपयोग) । परंतु साथ-साथ ऐसे किरदार जो ऐसी काली छाया के रूप में प्रदर्शित किये गए हैं जो अंत में परछाईं मात्र में सिमट कर रह जातीं हैं । और आखिरकार कलाकार को जो विषय सबसे अधिक प्रिय है वह है सार्वजनिक वाहनों का जो स्थानांतरण व गति का प्रतीक है । २०१३ में बनाए गए इन दो कलाकृतियों में जेरार्द केनॅम लंदन टैक्सी के माध्यम से लंदन प्रवास के साथ-साथ झाड़ी टैक्सी द्वारा अफ़्रीकी महाद्वीप व ख़ासकर बेनिन की याद दिलाता है ।

झाड़ी टैक्सी अफ़्रीकी महाद्वीप के यातायात के साधनों का विशिष्ट लक्षण हैं । अपने छोटे आकार के बावजूद यह बहुत बड़ी मात्रा में वस्तुओं को ढोतीं हैं जिनमें से कुछ इनकी छतों पर रखीं होतीं हैं । जेरार्द केनॅम ने इस अतिरिक्त भार को एक बड़े पिंजरे में बंद एक चिड़िया के माध्यम से दर्शाया है । टैक्सी के बाहर खड़ा एकमात्र व्यक्ति उस पूरी भीड़ का प्रतिनिधित्व करता है जो आमतौर पर अफ़्रीका के बस अड्डों पर देखी जा सकती है ।

सैम्यूएल फ़ोस्सो सम्मोहक छवि


केवल सजीले रंगीन किरदार ! एक जलदस्यु ? एक मध्यम-वर्गीय महिला ? एक जीवन-रक्षक तैराक, एक नाविक, एक रॉक-गायक, एक अफ़्रीकी सरदार ? तथापि विषय सदा एक ही है : फ़ोटोग्राफ़र जो स्वयं को विभिन्न रूपों में स्वयं खींचीं गईं अपनी तस्वीरों के माध्यम से विभिन्न रूपों में दर्शाता है जिनमें वह पारलिंगी वेशधारी व सजा-संवरा विभिन्न उपहासात्मक व आद्यप्ररूपीय किरदारों को निभाता हुआ दिखाई देता है । यह दस फ़ोटो पैरिस के बार्बेस नामक लोकप्रिय इलाके में स्थित सुप्रसिद्ध दुकानों की श्रंखला की पचासवीं वर्षगाँठ के अवसर पर विशेष आदेश पर १९९७ में खींची गई ताती श्रंखला का हिस्सा हैं । ताती श्रंखला का अनुकरण के परे एक वास्तविक समीक्षात्मक आयाम है : सैम्यूएल फ़ोस्सो अपनी तस्वीरों व स्वांग के माध्यम से पाश्चात्य रूढोक्तियों या फिर राजनीति का उपहास करता है ।

मध्य-अफ़्रीकी गणराज्य के बांगी का निवासी सैम्यूएल फ़ोस्सो कैमरून से है व लगातार निरंतर उस शैली में रचता जा रहा है जिसमें उसे महारत हासिल है : स्वयं अपनी तस्वीरें खींचना ।

ब्रूस क्लार्क सम्मोहक छवि


अब मुक्केबाजी के विषय में दो कलाकृतियों को देखने चलें : २००५ में रचित अशोचनीय व २०११ में रचित खेल शुरू होता है । निकट आएँ व आप ब्रिटेन-निवासी दक्षिण अफ़्रीकी कलाकार ब्रूस क्लार्क की विशिष्ट शैली देख पाएँगे । वह चित्रकला व कागज़ों को चिपकाने, शब्दों व छवियों को जोड़ते हुए आरोप व पारदर्शिता के प्रभावों का उपयोग करता है । ब्रूस क्लार्क एक प्रतिबद्ध कलाकार है जो हमें एक ऐसे खेल के विषय में बताता है जिसका इतिहास नागरिक अधिकारों हेतु लड़ाई से गहराई से जुड़ा है  संयुक्त राज्य अमरीका में गोरों व कालों के बीच मुक्केबाजी पर प्रतिबंध था । १९१० में जैक जॉनसॅन, मुक्केबाजी के प्रथम काले विश्व-विजेता, को उसका पदक पुनः जीतने के लिए खेलने से रोक दिया गया । अपनी प्रतिष्ठा के लिए उसकी लड़ाई को काली व सफ़ेद जनता के बीच बराबरी की कोशिशों के दृष्टांत के रूप में देखा जा सकता है । जब आखिरकार वह इसमें भाग लेने में कामयाब हुआ तो उसकी विजय की घोषणा के पश्चात देशभर में जातिवादी दंगे शुरू हो गए । २०वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुक्केबाजी कई बार सामाजिक श्रेणी में आगे बढ़ने का एकमात्र माध्यम होती थी । ब्रूस क्लार्क हमसे मुक्केबाजी के विषय में समकालीन सामाजिक द्वंद्व की उपमा के रूप में बात करते हैं ।

फ़्रेदेरिक ब्रूली बुआब्रे सम्मोहक छवि


इस समय आप बेकोरा की दन्तकथा के समक्ष खड़े हैं जो आइवरी कोस्ट के २०१४ में दिवंगत कलाकार फ़्रेदेरिक ब्रूली बूआब्रे के १२ छोटे चित्रों की एक श्रंखला है । निकट जा कर देखें तो आप देख पाएँगे कि इनमें चित्रकला व लेखन का मिश्रण है जिन्हें गत्ते पर पेन्सिल, मोमी रंगों व स्याही से रचा गया है ।

यह श्रंखला बेकोरा नामक एक शिकारी की कहानी सुनाती है जो एक शिकार-अभियान के दौरान ग्ब्ली नामक एक अजगर से मिल उसकी जान बचाता है । उसका धन्यवाद करने के लिए ग्ब्ली उसे वह सब देने का प्रस्ताव रखता है जिसकी उसे इच्छा है । बेकोरा अमरत्व मांगता है । तो ग्ब्ली उसे एक पौधानुमा तावीज़ व उसके साथ की जाने वाली प्रयोग-विधि दर्शाता है । गाँव वापस आने के बाद बेकोरा अपनी पत्नी को पूरी कहानी सुनाता है व उससे निवेदन करता है कि वह उस समय नाग के निर्देशानुसार पूरी क्रिया करे जब वह सो रहा हो । कुछ घंटों पश्चात पत्नी को अपने पति के स्थान पर कंकर मिलते हैं । अतः यह लोकोक्ति बनी : "अमरत्व की चाह करने वाला कंकर बन जाता है" ।

फ़्रेदेरिक ब्रूली बुआब्रे द्वारा बनाए गए हज़ारों अन्य चित्रों के साथ इस किंवदती को बताने वाले बारह चित्र “विश्व संबंधी जानकारी” नामक कलाकृति बनाते हैं जो एक ऐसे सार्वभौम विश्वकोश बनाने का प्रयास जो इस कलाकार ने तकरीबन आधी शताब्दी तक जारी रखा ।

साइप्रियां तोकूदाग्बा सम्मोहक छवि 


अब साइप्रियां तोकूदाग्बा से मिलें ! उसकी कृति दाहोमे राज्य के सांस्कृतिक व धार्मिक इतिहास से घनिष्ठता से जुड़ी है । आपको क्या दिखाई दे रहा है ? एक भैंस ? एक फल ? हाँ परंतु वे इससे परे कुछ और भी हैं । २०१२ में दिवंगत बेनिन के कलाकार साइप्रियां तोकूदाग्बा में मान्यताओं व इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने की तीव्र इच्छा थी जो उन्होंने अपने एक्रीलिक रंगों से कनवास पर बने चित्रों में दाहोमे राजाओं के चिन्हों को बना पूरी की । २००५ में बनाया गया चित्र, भैंस, गेज़ो राजा का चिन्ह है । यह शक्तिशाली जानवर यह दर्शाता है कि राजा को उसकी योजना लागू करने से कुछ भी नहीं रोक सकता । हम भैंस के नीचे ओखली देख सकते हैं जो राज्य की राजधानी अबोमे शहर का प्रतीक है । जहाँ तक फल का सवाल है तो २००६ में बनाया गया यह चित्र अगोंग्लो राजा का चिन्ह है । स्थानीय भाषा में ताड़ के फल को एगोन कहते हैं । यह चिन्ह इस कहावत की ओर इशारा करता है “ताड़ के पेड़ पर बिजलीगिरी परंतु अपनी लंबाई के बावजूद ताड़ का पेड़ उससे बच निकला" । यह राजा की बिछाए गए जालों से बच निकलने व राज-कार्य में सामने आने वाली कठिनाइयों का सामना कर विजयी होने की क्षमता की ओर सीधा इशारा है ।

ज्योर्ज लिलांगा सम्मोहक छवि


२००५ में दिवंगत ज्योर्ज लिलांगा तन्ज़ानिया के कलाकार हैं । समतल सतह पर रखे गए जीवंत रंगों वाले उनके चित्रों उनकी अपनी संस्कृति, माकोन्दे, बन्टू भाषा बोलने वाले लोग जो मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्वी तन्ज़ानिया व उत्तरी मोज़म्बीक में रहते हैं, के बड़े मिथकों पर पुनः दृष्टि डालते हैं । १९९८ में एक्रिलिक रंगों का उपयोग कर बनाए गए इन चार चित्रों में वे इन मिथकों पर एक नवीन दृष्टि डालते हैं । यहाँ हम एक ऐसा अस्त-व्यस्त संसार देखते हैं जिसमें अर्ध-मानव, अर्ध-काल्पनिक जीव भरे हैं । तथापि इन चित्रों में मौजूद प्रत्यक्ष स्वाधीनता एक कड़े निर्माण पर आधारित है जिसमें आकारों के इर्द-गिर्द काली परिरेखा है जो इन्हें अलग करती है ।

उमर विक्टर दियोप सम्मोहक छवि 


अभिमान के प्रसार-कक्ष में आपका स्वागत है । २०११ में खींचे गए यह तीन चित्र सेनेगॅल के फ़ोटोग्राफ़र उमर विक्टर दियोप के चित्रों की प्रथम कुछ श्रंखलाओं में से एक हैं । इनमें आप स्टूडियो में खींचे जाने वाली फ़ोटो को खींचने के नियम सहज पहचान सकते हैं । तैयार हो कर खिंचवाईं गईं तस्वीरें जिनमें वेशभूषा व श्रंगार की वस्तुओं के साथ-साथ पृष्ठभूमि पर भी विशेष ध्यान दिया गया है । लोकप्रिय व आधुनिक रूप में इनकी पुनर्व्याख्या की गई है जिससे उमर विक्टर दियोप की केवल फ़ोटोग्राफ़ी ही नहीं अपितु परिरूप व वेशभूषा की ओर विशेष रुचि दिखाई देती है । तैयार हो कर खींची गईं अफ़्रीकी शहरों के सांस्कृतिक रंगभूमि के अभिनेताओं की इन फ़ोटो के माध्यम से वे एक पूरी पीढ़ी का खाका खींच रहे हैं : एक पीढ़ी जो आधुनिक अफ़्रीका को समकालीन रचना का संगम-स्थल बनाती है ।

सोली सिस्से सम्मोहक छवि


सेनेगॅल के कलाकार सोली सिस्से की यह तीन कलाकृतियाँ पशु-चित्र नामक एक श्रंखला का हिस्सा हैं जो उन्होंने २००९ में मोमी रंगों व एक्रिलिक रंगों से कागज़ पर बनाईं थीं । इनमें हम अस्पष्ट आकार वाले रहस्यमय व चिंताजनक किरदार देख सकते हैं । सोली सिस्से एक ऐसी रचना जिसमें कुछ भी ज्यामितीय नहीं है के माध्यम से एक ऐसा संसार बना रहे हैं जो आधुनिकता (उनकी रचनाओं में बिखरे अंकों व अन्य रेखिका कूट के माध्यम से) की ओर अग्रसर है जो अधिक रहस्यमय है, एक ऐसा संसार जिसमें पशुओं का राज है । अपनी रचनाओं में संकर जीव दिखा कर कलाकार ने एक ऐसे समाज में मानवीय अवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाया है जिसमें लगातार बदलाव आ रहे हैं ।

रोमुआल्द हाज़ूमे सम्मोहक छवि 


बेनिन के कलाकार रोमुआल्द हाज़ूमे की इन दो कृतियों को ध्यानपूर्वक देखें । कनवास पर यह रंग व खुरदुरापन कहाँ से आ रहा है ? कलाकार ने प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया है : मिट्टी, गाय का गोबर, नील... और यह सब चिन्ह ? चौकोर, गोलाकार, बिंदू, सर्पाकार, लहरदार रेखाएँ, तीर : इनका क्या अर्थ है ?

रोमुआल्द हाज़ूमे ने १९९३ में बनाया गया लेते-मेजी व २००६ में रचित रानी नामक इन दोनो चित्रों में फ़ा, योरुबा का भविष्यवाणी करने का विज्ञान, के चिन्ह शामिल किये हैं । योरुबा लोगों के विश्व की योजना की ओर ग़ौर करें तो प्रत्येक चिन्ह अपने आप में एक पूर्ण ब्रह्मांड है । रोमुआल्द हाज़ूमे  इसका उपयोग एक सांस्कृतिक कड़ी के रूम में करते हैं जिसके माध्यम से वे स्वयं अपने, अफ़्रीका के भविष्य या फिर संसार के उद्भव के विषय में प्रश्न करते हैं । कलाकार स्वयं को इस संस्कृति का बताते हैं व स्वयं को एक “आर”, योरुबा का ख़ानाबदोश कलाकार जो अपनी यात्राओं के दौरान रीती-रिवाज़ प्रसारित करता है, के रूप में प्रस्तुत करते हैं ।

जे० डी० ’ओखाई ओजेइकेरे सम्मोहक छवि 


अब देखें आप नाइजीरिया के फ़ोटोग्राफ़ जे० डी० ’ओखाई ओजेइकेरे की केश-विन्यास श्रंखला के तीन चित्रों के समक्ष खड़े हैं । कलाकार को अपनी संस्कृति बचाए रखने की दिशा में फ़ोटोग्राफ़ी की अहम भूमिका का ज्ञान है व १९६८ से १९९९ के दौरान खींचे गए इन १००० से अधिक चित्रों के माध्यम से नाइजीरिया की स्त्रियों के केश-विन्यास प्रस्तुत करता है । इस प्रकार जे० डी० ’ओखाई ओजेइकेरे केश-विन्यासों, उनकी सुंदरता एवं उनके प्रलेखी चरित्र की एक अति-विविध यादगार बनाते हैं । दरअसल अफ़्रीका में केश-विन्यास केवल सुंदरता के लिए ही नहीं किया जाता । यह उस स्त्री की सामाजिक-स्थिति भी दर्शाता है जिसने यह किया हुआ है एवं जीवन की विभिन्न घटनाओं से भी जुड़ा है । अक्सर स्त्रियाँ कैमरे की ओर पीठ कर फ़ोटो खिंचवातीं हैं, गुमनाम, और कभी-कभार कैमरे की ओर अर्द्ध मुख या कैमरे के सामने पूरा चेहरा कर फ़ोटो खिंचवातीं हैं । इस प्रकार केश-विन्यास पर केंद्रित स्तंभ सर्जन उसका मूर्ति सदृश स्वरूप दिखाता है ।

जे० डी० ’ओखाई ओजेइकेरे द्वारा आदेश के आधार पर अपने स्टूडियो में खींचे गए चित्रों के अतिरिक्त उनके द्वारा निजी तौर पर खींचे गए चित्रों में केश-विन्यास श्रंखला सबसे अधिक प्रसिद्ध है । २०१४ में दिवंगत इस कलाकार की नज़र में यह एक सामूहिक कृति है : फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर उनकी पैनी नज़र, केश-विन्यास करने वाले कलाकार की प्रतिभा के साथ-साथ उस केश-विन्यास को करवाने वाली ग्राहक के चुनाव का संगम ।

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